एकला चलो रे..!

सदाग्रह एक विमर्श मंच है जहाँ प्रयास होगा विभिन्न समाधानों के लिए एक गाँधीवादी बौद्धिक पहल का...विमर्श से एक शांतिपूर्ण समाधान की खोज और एक अपील इसे अपनाने की।

मंगलवार, 2 अक्तूबर 2018

गांधी व्यक्ति होते तो विचार में भी उतरते: गाँधी और मै- प्रेम शंकर मिश्र

साभार: आईएमवायर 

गांधी के देश में गांधी उस वक्त खत्म नहीं हुए जब वे गोडसे का शिकार हुए। गांधी की सोच को सबसे अधिक नुकसान इस धारणा से पहुंचा कि ‘गांधी व्यक्ति नहीं विचार हैं।’ आजादी के बाद पैदा हुए लोगों के पास गांधी को जानने के लिए इकलौता जरिए किताबें है, लेकिन वो किताबें नहीं जो गांधी ने लिखकर छोड़ी हैं, हूबहू वैसी ही जैसे वे थे। तमाम पीढ़ियों ने गांधी को उन किताबों से जाना है जो स्कूल में अगले क्लास की सीढ़ी चढ़ने के लिए जरूरी थी। एक और तरीका सरकारी अनुष्ठान का है। यह गांधी के जाने के बाद से लेकर आजतक हूबहू वैसे ही चला आ रहा है। रामधुन का गायन, चरखा चलाना, उनके विचारों संग व्यभिचार करने वालों के मुंह से फूल झड़ना। बनावटपने और नकलीपन की बदबू हर दौर में एक जैसी। इसलिए गांधी एक अनुष्ठान के तरह दिमाग में चस्पा तो हैं लेकिन विचार के तरह दिल में और व्यहार की तरह आचरण में उतर न पाए। न कभी किसी सरकार ने चाहा कि गांधी आचरण में उतरे और न ही कभी बाजार ने। वजह साफ थी कि सरकार और बाजार के प्रचलित सोच के लिए तो गांधी जीते जी ही खतरा बन चुके थे। 

पाठ्यक्रम से इतर गांधीजी को पढ़ने की वजह वो नोट बनी जिस पर गांधीजी चस्पा हैं। वर्धा विश्वविद्यालय में गांधी के विचारों पर हर साल भाषण प्रतियोगिता होती थी। प्रथम पुरस्कार पर 10 हजार मिलते थे। सांत्वना में भी 2-3 हजार मिलना होता था। 2004 में हमारे लिए यह लाख से कम नहीं था। इसलिए यहां जाना हमारे लिए ओलपिंक सरीखा ही था। इस स्वार्थ ने गोरखपुर विश्वविद्यालय के लाइब्रेरी में रहे गांधी वांग्मय पर पड़ी धूल झाड़ने को मजबूर कर दिया।

संयोग देखिए कि गांधी को आम आदमी तक कहीं अधिक से सहजता से सिनेमा ने पहुंचाया। रिचर्ड एटेनबरो की ‘गांधी’ ने उनके वैचारिक पक्ष संग विलक्षण व्यक्तित्व की एक बड़े तबके तक पहुंच बनाई। ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ की ‘गांधीगीरी’ ने सीमित संदर्भ में ही यह बज क्रिएट किया कि गाली के बजाय फूल देना भी असर करता है। हालांकि, इन सबकी सीमाएं यह थी कि यह त्वरित प्रभाव से उभरी प्रतिक्रिया थी अंतर्निहित आचरण का भाग नहीं। इसलिए ये धूमकेतु की तरह चमके और खत्म हो गए। 

गांधी का मूल्यांकन और विमर्श व्यक्ति के तौर पर होता तो वे स्वाधीनता आंदोलन की परिधि से बाहर निकल सहमतियों और असहमतियों के लिए भी प्रस्तुत होते। इससे गांधी की सर्जना और वर्जना दोनों को लेकर ही उठने वाले आवश्यक और अनावश्यक प्रश्न उत्तरित होते। भ्रांतियों को तथ्य के तौर पर स्थापित होने, गांधी के बहुत से प्रयोगों को अतिवाद के तौर पर प्रचारित किये जाने की से बचा जा सकता था। यह समझना आसान होता कि गांधी में हमे जो चरम, हठ या अतिवाद दिखता है वह इसलिए है क्योंकि कर्म और व्यवहार के साम्य को हमने कभी जिया नहीं और गांधी कभी उससे डिगे नहीं। इसलिए जो हमारे लिए चरम है वह उनके लिए सहज था। 

इसलिए सबसे जरूरी था कि व्यक्ति के तौर पर, नजीर के तौर पर गांधी हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में जोड़े जाते। गांधी की सत्यप्रियता, स्वच्छता, समता के मूल्य की प्रारंभिक शिक्षा तो अपने अभिभावकों के जरिए हममें से हर कोई बचपन में पाता है। लेकिन, यह हमारे विकास के साथ ही दम इसलिए तोड़ने लगती है क्योंकि आचरण व आत्मानुशासन को लेकर जो आग्रह हमारे साथ बचपन में जुड़ते हैं उन्हें बड़ा होते ही अनावश्यक मान लिया जाता है। इसके साथ ही गांधी लाइब्रेरी की कोठरियों के अंधेरों में खो जाते हैं। 

गांधी ने स्वाधीनता के आंदोलन में अहिंसा के तत्व को प्रधानता इसलिए दी क्योंकि दक्षिण अफ्रीका में कमोवेश ऐसी ही परिस्थतियों में वह इसका सफल प्रयोग कर सके थे। उन्हें पता था कि अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध की सीमाएं संसाधन ही नहीं वैश्विक अवधारणाओं से भी जुड़ती थीं। इसमें हर पक्ष के पास सदैव स्वयं को सही ठहराने के बराबर मौके थे भले ही यह संघर्ष कितना ही एकतरफा क्यों न हो। अहिंसा एक ऐसा हथियार था है और रहेगा जो किसी भी कानून की कसौटी पर आपके विपक्ष में नहीं जा सकता। हम बड़ी आसानी से जब इसे नकार देते हैं तो वास्तव में इसके पीछे के आत्मानुशासन व तपस्या की लंबी यात्रा की उपेक्षा कर देते हैं। जरा सोचिए! छोटी से छोटी बात पर हमारा खून उबलता है। सामने वाले को सबक सिखाने के लिए मन आतुर रहता है। किसी भी घटना पर त्वरित व प्राथमिक विचार हिंसा का आता है। हिंसा के प्राथमिक भाव को अहिंसा से विस्थापित करना इतना सहज है क्या? एक बड़ा तबका बुनियादी जरूरतों का मोहताज है इसलिए अपनी सुविधाओं को लात मार देना सहज है क्या? सबसे बड़ी बात! पहाड़ जैसी ऊंचाई छूने के बाद भी खुद को गलत मानने और अपनाने खिलाफ भी खड़ा होने का साहस सहज है क्या? गांधी के हर सिद्धांत स्वयं से शुरू होते हैं और हमारे दूसरों से। इसलिए गांधी विचार की दहलीज पर ही टकराकर लौट जाते हैं।

*लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं सम्प्रति प्रतिष्ठित नवभारत टाइम्स में प्रधान संवाददाता हैं। 

रविवार, 2 अक्तूबर 2016

गांधीजी के जन्मदिन पर-दुष्यंत कुमार


मैं फिर जनम लूँगा
फिर मैं
इसी जगह आऊँगा
उचटती निगाहों की भीड़ में
अभावों के बीच
लोगों की क्षत-विक्षत पीठ सहलाऊँगा
लँगड़ाकर चलते हुए पावों को
कंधा दूँगा
गिरी हुई पद-मर्दित पराजित विवशता को
बाँहों में उठाऊँगा ।

इस समूह में
इन अनगिनत अनचीन्ही आवाजों में
कैसा दर्द है
कोई नहीं सुनता!
पर इन आवाजों को
और इन कराहों को
दुनिया सुने मैं ये चाहूँगा ।

मेरी तो आदत है
रोशनी जहाँ भी हो
उसे खोज लाऊँगा
कातरता, चुप्पी या चीखें,
या हारे हुओं की खीज
जहाँ भी मिलेगी
उन्हें प्यार के सितार पर बजाऊँगा ।

जीवन ने कई बार उकसाकर
मुझे अनुल्लंघ्य सागरों में फेंका है
अगन-भट्ठियों में झोंका है,
मैने वहाँ भी
ज्योति की मशाल प्राप्त करने के यत्न किए
बचने के नहीं,
तो क्या इन टटकी बंदूकों से डर जाऊँगा ?
तुम मुझको दोषी ठहराओ
मैने तुम्हारे सुनसान का गला घोंटा है
पर मैं गाऊँगा
चाहे इस प्रार्थना सभा में
तुम सब मुझपर गोलियाँ चलाओ
मैं मर जाऊँगा
लेकिन मैं कल फिर जनम लूँगा
कल फिर आऊँगा ।

शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

याद तो आती ही है..क्यों नही आयेगी याद जादूगर की


याद तो आती ही है..क्यों नही आयेगी याद जादूगर की जिसने साधारण ढंग से असाधारण रचा हो..क्यों नही याद आयेगी उसकी जिसने लगभग नंगे रहकर सबको खादी पहनाना चाहा हो..मन नही भूल सकता उसे जिसने उपवास रखा हो बार-बार कि बाकी कोई भूखा ना हो, जिसने सदाग्रह रखा हो राम से कि फिर-फिर नोआखाली ना हो..हर समय याद आयेगी उस बूढ़े की हमें, क्योंकि घड़ी हमेशा उसके साथ रही..क्षण-क्षण की नब्ज पे पकड़ थी उस फ़कीर की...याद तो आयेगी ही ना उसकी कि उसने खुद साफ़ किये कितने ही कोलोनियों के पाखाने, ताकि तन के साथ मन साफ़ रहे लोगों के....पर.....बाध्य हूँ मै...इन बिन्दुओं में ही शायद कुछ कह पाऊं..क्योंकि हर हालात का जिम्मेदार मै भी तो हूँ..........!!!
अभिनव उपाध्याय से भी रहा ना गया...अपना भोलापन छिपा ना सके..यहाँ वे गाँधी जी को ठीक वैसे याद कर रहे हैं जैसे शास्त्री जी , इस अभागे समय में महात्मा को याद करते.....! 
देश की सरकार ने देश भर में "अवकाश" जो दे दिया है..! याद तो आयेगी ही...पर महत्वपूर्ण यही है कि कैसे याद किये जा रहे बापू...आइये देखते हैं..!  --
श्रीश पाठक




गांधी। फिर एक बार तुम याद आए।  सबको। सच। मंत्री। प्रधानमंत्री। गृहमंत्री। सबने किया तुम्हे याद। और तो और। भोंपू बजाने वाली। मीडिया को भी। राम नाम। सबने बजाया। बापू। सबने गाया। तुम्हारा गीत। लेकिन। आज के भारत की। कुछ और ही रीति। कि। जब जब हम होते। अधीर। मसले हों जब गंभीर। हम तभी याद करते। हम खोज लेते हैं। अपना फायदा। नाम में। काम में। इस्तेमाल हम जानते हैं। बखूबी। तुम्हारे लिए। राम तो राम है। उतना ही प्यारा। जितना अल्लाह। महात्मा। तुम तो ठीक थे। हमारा राम। हो गया दूसरा। तुम्हारा राम। वनवास से आया था। लेकिन हमने दिया। लम्बा वनवास। राम तुम आओ। अल्लाह बन कर। चाहे गॉड बन कर। हमे जरूरत है। बापू। हमें शक्ति दो। कि हम केवल गांए नहीं। निभाएं। हों मजबूत। संमति दो। विवेक दो। मन हो। अहिंसक। पावन। सरल। सहज..!


शुक्रवार, 21 मई 2010

गाँधी जी की ताबीज:एक बहु-प्रचलित उद्धरण

गांधी जी की ताबीज

गांधी जी कहते हैं, मैं तुम्‍हें एक ताबीज देता हूँ। जब भी दुविधा में हो या जब अपना स्‍वार्थ तुम पर हावी हो जाए, तो इसका प्रयोग करो। उस सबसे गरीब और दुर्बल व्‍यक्ति का चेहरा याद करो जिसे तुमने कभी देखा हो, और अपने आप से पूछो- जो कदम मैं उठाने जा रहा हूँ, वह क्‍या उस गरीब के कोई काम आएगा? क्‍या उसे इस कदम से कोई लाभ होगा? क्‍या इससे उसे अपने जीवन और अपनी नियति पर कोई काबू फिर मिलेगा? दूसरे शब्‍दों में, क्‍या यह कदम लाखों भूखों और आध्‍यात्मिक दरिद्रों को स्‍वराज देगा?
  तब तुम पाओगे कि तुम्हारी सारी शंकाएं और स्वार्थ पिघल कर खत्म हो गए हैं.

Source: Mahatma Gandhi [Last Phase, Vol. II (1958), P. 65].

सोमवार, 16 नवंबर 2009

नायक नेपथ्य में चला जा रहा था-- गाँधी और मै: सुशील यादव


[देखिये ना गाँधी किन-किन के लिए क्या-क्या हैं .इसतरहा है महामना गाँधी की व्यापकता..सुशील जी गहरे सरोकारों के लेखक हैं. इनकी कुछ बेहतर रचनाएँ "हम तो कागज मुड़े हुए हैं" पर जाकर पढ़ी जा सकती हैं..श्रीश पाठक ]
घर में खादी के व्यवसाय के चलते, गांधीजी की फ़ोटो झाड़ते-पोछते बड़ा हुआ.तब गांधी मेरे लिये मेरे बाबा की तरह दिखने वाले एक बाबा ही थे--गंजा सिर, चश्मा, धोती, लाठी, घड़ी....और कुछ था तो ये कि अपने स्कूल मे(शिशु मन्दिर) मे हर महापुरुषों की भांति गांधी जी की जयंती मनायी जाती थी. तथाकथित मेधावी छात्र की हैसियत से मै भी उस जयंती मे गांधी पर भाषण देता. आदरणीय प्रधानाचार्य-मुख्यअतिथी महोदय से प्रारंभ होने वाला भाषण कब जय हिन्द-जय भारत के साथ खतम हो जाता पता ही नही चलता. सब कुछ रटा-रटाया; पर ये तो गांधी को जानना था ही नही..!
ऐसे ही घर पे, गाँधी जयन्ती का मतलब आज से दूकान पर छूट शुरू हो जाएगी. दूकान पर झंडी-पतंगी लगाने का काम मेरा. दूकान सज जाती थी, घर में खुशी रहती थी कि अगले तीन-चार महीनों तक दुकान 'अच्छी' चलने वाली है.
फिर हाईस्कूल, इंटरमीडीएट में तो यह सब भी छूटा, बोर्ड परीक्षा का भय, फर्स्ट डीविजन की चुनौती बाकी बचा तो क्रिकेट और प्रेमिका की तलाश...
अध्ययन, जीवन और उम्र की गंभीरता बढ़ने के साथ गाँधी को पढ़ने का मौका मिला. बचपन के उन भाषणों के रटे-रटाये शब्द 'सत्य', 'अहिंसा', 'स्वराज', 'सत्याग्रह' अब जादू लगने लगे. कई ऐसे मौकों भी आते जब बस, ट्रेन, चाय की दुकान पर यही सुनता था कि--'गन्हिया देस बेच दिहिस...' खुद मै भी कभी-कभी शामिल हो जाता था. पर अब नहीं. शायद इसलिए कि किसी बहस में 'आ बैल मुझे मार..' वाली साबित होतीं. क्लास, प्रोफेसर्स के लेक्चर्स, सेमिनार आदि से ज्यादा अच्छी तरह गाँधी का परिचय कराया मुझे कॉलिन्स और लैपियर की पुस्तक 'फ्रीडम एट मिडनाईट' ने..
सार रूप में कहूं तो गाँधी "दैनिक भास्कर' के उस स्लोगन के बिलकुल सटीक बैठते हैं--"जिद करो दुनिया बदलो.." इसके बाद ये कि-'जितना भारत को गाँधी --जानते थे उतना कोई अन्य नही; सिर्फ भारत को ही क्यों, ब्रिटिश साम्राज्य की नीतियों को, उनके भीतर छिपे अप्रगट मंतव्य को, तभी तो भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के शतरंज के खेल में गाँधी अंग्रेजों की चाल पहले भांप जाते थे..! और चेक एंड मेट का करिश्मा तभी संभव हो सका. लेकिन आजादी जितनी करीब आती जा रही थी गाँधी उतने ही हाशिये पर, यह एक दुखांत नाटक की पटकथा थी...कि नायक नेपथ्य में चला जा रहा था.
राम, कृष्ण,बुद्ध को तो मैंने नहीं देखा..खैर गाँधी को भी नही लेकिन फिर भी गांधीजी को छोड़ शेष तीनों के जीवन की कुछ कथाएं तो गढ़ी-गढ़ायीं व कोमिक्स की भांति लगती हैं. बहुत संभव है कि आने वाली गाँधी को भी एक मिथक के रूप में ही मानने लगे.
अंत में--यदि मै गढ़ूं कोई गाँधी-स्मृति भवन या कुछ ऐसा ही तो परिचयात्मक वाक्यांशों में ये शब्दावलियाँ होगी--स्वीकार का धैर्य, अस्वीकार का साहस, जिद और सदाग्रह...
                                                          सुशील यादव 
       {लेखक दिल्ली विश्वविध्यालय से हिंदी विषय में शोधरत हैं और सदाग्रह के सम्पादकीय समूह से सम्बद्ध हैं} 
(चित्र साभार:गूगल)

मंगलवार, 3 नवंबर 2009

"रोज सुबह मन में एक गांधी को लेकर उठता हूं" गाँधी और मै-अभिनव उपाध्याय




मुझे लगता है कि मैं आज तक गांधी को ठीक से जान नहीं पाया। बहुत सारी छोटी, बड़ी, पतली मोटी किताबें पढीं,लोगों की टिप्पणियां  पढ़ी लेकिन हर बार लगा गांधी केवल इतने ही नहीं हैं अभी इससे अलग हैं।  गांधी को जिसने जैसे देखने की कोशिश की गांधी उसे वैसा ही दिखते हैं. मुझे शायद गांधी सबसे अधिक तब करीब लगते हैं जब मैं अपने को असहाय महसूस करता हूं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मेरा मानना है कि मजबूती का नाम महात्मा गांधी।

गांधी को और जानने या यूं कहें खूब जानने का मन तब किया जब मां बाप की बड़ी उम्मीदों के बाद भी मैं दसवीं में फेल हो गया (मैं शुरु से ही गणित में उस्ताद नहीं था और सच कहूं तो अब भी नहीं हूं जिन्दगी के जोड़ घटाने में अक्सर हासिल छूट ही जाता है। )

फेल होने के बाद मैं बड़े संकोच से लोगों के सामने जाता और अगर घर पर रिश्तेदार आ जाते तो मेरी तो हालत खराब.. क्योंकि जो आता मेरे फेल होने पर अफसोस जताता, कोई मेरी गलती बताता लेकिन एक रिश्तेदार आए और उन्होंने  बताया कि कैसे असफलता से हौंसला न हार कर मंजिल को पाया जा सकता है इसके लिए उन्होंने गांधी का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि महात्मा गांधी भी पढ़ाई में कोई उस्ताद नहीं थे। बस क्या था, मेरे दिमाग में पहली क्लास से लेकर 10वीं तक के बीच जितने भी गांधी के चित्र उनसे जुड़ी बांते जानता था वह घूम गई। मैं महात्मा गांधी के बारे में तब इतना ही जानता था कि यह बुजुर्ग आजादी की लड़ाई का हीरो था जो  लाठी-डंडा खाया और देश को आजाद कराया, बस।

मुझे यह कहने में जरा भी संकोच नहीं कि तब मेरे प्रिय भगत सिंह और सुभाष चन्द बोस थे (मैं आज भी उनका आदर करता हूं) जो बंदूक चलाते थे। हम बचपन में भी अगर बाबा के कंधों पर मेला देखने जाते तो बंदूक लेने की ही जिद करते थे। लेकिन फेल होने के बाद मैं गांधी से जुड़ी किताबें पढ़ने लगा। गणित पर अधिक ध्यान देने लगा और बमुश्किल पास भी हो गया। फिर पढ़ने की ऐसी लत लगी कि कई किताबें पढ़ी। दुनिया को नए सिरे से समझना और देखना शुरू किया।

मुझे आश्चर्य होता है कि गांधी ने अहिंसा सत्याग्रह के जो प्रयोग किए वह आसान नहीं थे। आज भी मैं अपनी व्यक्तिगत कई समस्याओं का समाधान गांधी के तरीके से ही ढूंढता हूं। मैं जब गांधी के विचारों को अपने दोस्तों को बताता था तो कुछ मित्रों द्वारा बेकार, कमजोर या कुछ हद तक बेवकूफ भी कह दिया जाता था (कह दिया जाता हूं)। लेकिन राजनीतिशास्त्र का  विद्यार्थी और वर्तमान में एक पत्रकार होने के कारण मैं गांधी की दूर दृष्टि का कायल हूं। बहुत सारी समस्या और एक समाधान गांधी।

मैं गांधीवादी नहीं हूं क्योंकि गांधी के ऐसे बहुत से सिद्धांत हैं जो जिन्हे भूमंडलीकरण के दौर में नए सिरे से देखे जा रहे हैं और यह समय की मांग  भी है। लेकिन स्व के नियंत्रण का जो तरीका या शत्रु या प्रतिद्वंदी के प्रति भी अहिंसा और प्रेम का भाव जो गांधी जी बताते हैं मैं इसका कायल हूं। आत्मशुद्धि आत्मनियंत्रण और शाकाहार जसी अवधारणा वर्तमान हमें काफी कुछ दे सकती हैं। गांधी जब न्यासिता या श्रम की व्याख्या करते हैं तो वह मार्क्‍स के करीब आ जाते हैं लेकिन कहीं भी वह हिंसक क्रांति की बात नहीं करते। शायद इसी लिए वह सहस्त्राब्दी के महापुरुष कहे जा रहे हैं।


मैं जिस पेशे से हूं उसमें रोज सुबह मन में एक गांधी को लेकर उठता हूं, दिन भर कई जहग धक्के खाता हूं, शाम को खबरें करता हूं (लेकिन गांधी को खबरों से दूर ही रखता हूं ) रात को मैं और मेरे मन का गांधी खाना खाकर सो जाता है। अगले दिन फिर कई गांधी, आजादी से पहले का गांधी, नेहरु का गांधी, इंदिरा का गांधी, सोनिया-मनमोहन का गांधी, कम्युनिस्टों और सोसलिस्टों का गांधी, मुन्नाभाई- सर्किट का गांधी और रात आते-आते फिर मैं और मेरा गाँधी.

{लेखक नई दिल्ली में सक्रिय पत्रकार हैं. आपने ही "सदाग्रह" ब्लॉग का विचार सुझाया.यह लेखक की पहली पोस्ट है}



(चित्र साभार:गूगल)(दायें चित्र में --अभिनव उपाध्याय)

सोमवार, 26 अक्तूबर 2009

व्यक्ति को , विकार की तरह पढ़ना , जीवन का अशुद्ध पाठ है...गाँधी और मै--अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी















किसी सोच का दायरा इतना बड़ा हो सकता है ; यह गांधी जी पर सोचते हुए महसूस होता है क्योंकि गाँधी जी पर सोचना खुद पर सोचना है परिवेश पर सोचना है, इतिहास पर सोचना है, भविष्य पर सोचना है, संस्कृति पर सोचना है.....और इस सबके निराशा, उलझाव, विसंगति, प्रभृति स्थितियों को अपनी संजीवनी शक्ति से निष्क्रिय करती एक अभय वास्तविकता हमारी प्रेरणा बनाती है--"गाँधी जी मर सकते हैं लेकिन विचार नहीं."


"इस नोट पर किनका चेहरा छपा है..!" गाँधी की तरफ ध्यानाकर्षण का यही पहला समय था. बचपन की किसी लोरी में गाँधी जी कभी नहीं आये. हाँ, 'भकाऊं' के नाम के डर से बच्चे सुलाए जाते थे. अच्छा ही है सुलाने के लिए गाँधी जी नहीं बुलाये जाते.आगे चलकर वर्ष में आने वाले तीन राष्ट्रिय पर्वों में 'महात्मा गाँधी की जय' ने बाल मन को गाँधी जी के और नज़दीक ला दिया था. मौसमों की तरह वर्ष भी बीतने लगे. आयु ११ वर्ष की थी और न भुलाया जा सकने वाला 'मंदिर-मस्जिद' विवाद का सन बानबे का समय. लोग घर-गांव, चौराहे, बाजार आदि जगहों पर 'हिन्दू-मुस्लिम' समस्या पर बतियाते थे. कभी-कभी कान में आवाज पड़ती-"मेन गलती तो गाँधी जी किहिन...". तब समझ में नहीं आता था, आखिर ऐसी क्या गलती कर डाली थी बापू ने? बंटवारा, हिन्दू, मुस्लिम, गाँधी, मंदिर, मस्जिद...विकट पहेली सुलझ नहीं पाती थी. मेरा तो बचपना था और पहेली बुझाने वाले लोग तो बड़े लोग थे.


"गाँधी जी के बारे में मेरे बचपन के साथी को एक बात पता चली. बात थी--'कोई एक गाल पर तमाचा दे तो उसके सामने दूसरा गाल भी कर दो.' अलाव के चारों ओर बैठे लोगों में से सरपंच के सामने साथी ने यह बात कही. लुल्लुर सरपंच जो कि तेल-पिलाई लाठी लेकर चलते थे, चालू हो गए--"सब फालतू की बात है. इतना तेज रसीदों कि फिर हिम्मत ना कर सके मारने की. ज्यादा गाँधी की मत सुनों बेटा. डरपोक बनाते हैं, गाँधी..!" लुल्लुर सरपंच मोंछ ऐंठ कर चालू थे--''जो ताको कांटा बोए, ताहि बोउ तू भाला / वो भी साला क्या जाने पड़ा किसी के पाला.//"




मेरी हिम्मत ना थी, सरपंच साहब से कुछ पूँछता. हाँ; सरपंच साहब अभी कुछ महीने पहले दिवंगत हुए हैं और 'शक्तिमेव जयते' में विश्वास रखने वाले लुल्लुर इतने शक्तिहीन हो गए थे कि अपनी आँखों के सामने ही अपने लड़कों को मार-काट करते देखकर रोक ना सके. फौजदारी होती रही और घर की इज्जत बनिए की आढ़त पर जाकर बिकती रही. पोते-पोती सही से पढ़ ना सके. काश सरपंच साहब अपने बच्चों को (जिन्हें वे गुरुर से थानेदार और जिलेदार नाम से बुलाते थे) धैर्य,त्याग, समता, प्रेम, सत्य जैसे मूल्यों को सिखाते..सत्यमेव जयते बताते.


यह घटना व्यापक तौर पर देश के लिए भी सत्य साबित हो रही है, जहाँ थानेदार और जिलेदार, मजहब, क्षेत्र, जाति, आदि के रूप में देख सकते हैं.


अंतिम बात..एक मुहाविरे कि. बहुत लोग कहते हैं--"मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी". क्या मजबूरी थी...शायद लोग सोचते नहीं. यह गलत कहावत जाने कैसे इतनी व्यापक हो गयी और लोगों ने इसकी सच्चाई नहीं परखी. जिस सत्य का आग्रह गाँधी जी करते रहे, हमने इस आग्रह को इतना तोड़ डाला. जिस सत्य को अंग्रेजों ने देखा, उसको भी ना देख सके हम. लार्ड माउन्टबेटन ने गाँधी के तप और सत्य को देखा था. और नोआखाली, बंगाल में गाँधी जी के खिलाफ लड़ने की शक्ति (जो कि कदापि मजबूरी नहीं थी) को सलाम करते हुए माउन्टबेटन ने कहा था---"पंजाब में पचास हजार सैनिक सांप्रदायिक हिंसा को नहीं रोक सके और बंगाल में हमारी फौज में केवल एक ही आदमी है और वहां कोई हिंसा नहीं हुई. एक सेना अधिकारी और प्रशासक के रूप में इस व्यक्ति (गाँधी) की सेवा को मै सलाम करता हूँ.."
हिंदी के अतिरिक्त किसी और भाषा में शायद बापू पर ऐसी कहावत (मजबूरी का नाम...) नहीं बनी होगी. ऐसी कहावत हिंदी में है जिसके प्रचार-प्रसार के लिए गाँधी जी ने आपादमस्तक परिश्रम किया था.




मित्रों ! सीमायें किसी की भी हो सकती हैं, परन्तु हमें सीमाओं को सीमा कहना चाहिए ना कि शक्तियों को. कमियों को कमियां कहना चाहिए ना कि अच्छाइयों को. जीवन में यह सदाग्रह बना रहना चाहिए






कि "व्यक्ति को , विकार की तरह पढ़ना , जीवन का अशुद्ध पाठ है.."(कवि कुंवर नारायण के शब्दों में).



चित्र साभार:गूगल










(लेखक अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी जवाहर लाल नेहरू विश्वविध्यालय में आचार्य नामवर सिंह के मार्गदर्शन में शोधरत है.)