एकला चलो रे..!

सदाग्रह एक विमर्श मंच है जहाँ प्रयास होगा विभिन्न समाधानों के लिए एक गाँधीवादी बौद्धिक पहल का...विमर्श से एक शांतिपूर्ण समाधान की खोज और एक अपील इसे अपनाने की।

मंगलवार, 3 नवंबर 2009

"रोज सुबह मन में एक गांधी को लेकर उठता हूं" गाँधी और मै-अभिनव उपाध्याय




मुझे लगता है कि मैं आज तक गांधी को ठीक से जान नहीं पाया। बहुत सारी छोटी, बड़ी, पतली मोटी किताबें पढीं,लोगों की टिप्पणियां  पढ़ी लेकिन हर बार लगा गांधी केवल इतने ही नहीं हैं अभी इससे अलग हैं।  गांधी को जिसने जैसे देखने की कोशिश की गांधी उसे वैसा ही दिखते हैं. मुझे शायद गांधी सबसे अधिक तब करीब लगते हैं जब मैं अपने को असहाय महसूस करता हूं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मेरा मानना है कि मजबूती का नाम महात्मा गांधी।

गांधी को और जानने या यूं कहें खूब जानने का मन तब किया जब मां बाप की बड़ी उम्मीदों के बाद भी मैं दसवीं में फेल हो गया (मैं शुरु से ही गणित में उस्ताद नहीं था और सच कहूं तो अब भी नहीं हूं जिन्दगी के जोड़ घटाने में अक्सर हासिल छूट ही जाता है। )

फेल होने के बाद मैं बड़े संकोच से लोगों के सामने जाता और अगर घर पर रिश्तेदार आ जाते तो मेरी तो हालत खराब.. क्योंकि जो आता मेरे फेल होने पर अफसोस जताता, कोई मेरी गलती बताता लेकिन एक रिश्तेदार आए और उन्होंने  बताया कि कैसे असफलता से हौंसला न हार कर मंजिल को पाया जा सकता है इसके लिए उन्होंने गांधी का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि महात्मा गांधी भी पढ़ाई में कोई उस्ताद नहीं थे। बस क्या था, मेरे दिमाग में पहली क्लास से लेकर 10वीं तक के बीच जितने भी गांधी के चित्र उनसे जुड़ी बांते जानता था वह घूम गई। मैं महात्मा गांधी के बारे में तब इतना ही जानता था कि यह बुजुर्ग आजादी की लड़ाई का हीरो था जो  लाठी-डंडा खाया और देश को आजाद कराया, बस।

मुझे यह कहने में जरा भी संकोच नहीं कि तब मेरे प्रिय भगत सिंह और सुभाष चन्द बोस थे (मैं आज भी उनका आदर करता हूं) जो बंदूक चलाते थे। हम बचपन में भी अगर बाबा के कंधों पर मेला देखने जाते तो बंदूक लेने की ही जिद करते थे। लेकिन फेल होने के बाद मैं गांधी से जुड़ी किताबें पढ़ने लगा। गणित पर अधिक ध्यान देने लगा और बमुश्किल पास भी हो गया। फिर पढ़ने की ऐसी लत लगी कि कई किताबें पढ़ी। दुनिया को नए सिरे से समझना और देखना शुरू किया।

मुझे आश्चर्य होता है कि गांधी ने अहिंसा सत्याग्रह के जो प्रयोग किए वह आसान नहीं थे। आज भी मैं अपनी व्यक्तिगत कई समस्याओं का समाधान गांधी के तरीके से ही ढूंढता हूं। मैं जब गांधी के विचारों को अपने दोस्तों को बताता था तो कुछ मित्रों द्वारा बेकार, कमजोर या कुछ हद तक बेवकूफ भी कह दिया जाता था (कह दिया जाता हूं)। लेकिन राजनीतिशास्त्र का  विद्यार्थी और वर्तमान में एक पत्रकार होने के कारण मैं गांधी की दूर दृष्टि का कायल हूं। बहुत सारी समस्या और एक समाधान गांधी।

मैं गांधीवादी नहीं हूं क्योंकि गांधी के ऐसे बहुत से सिद्धांत हैं जो जिन्हे भूमंडलीकरण के दौर में नए सिरे से देखे जा रहे हैं और यह समय की मांग  भी है। लेकिन स्व के नियंत्रण का जो तरीका या शत्रु या प्रतिद्वंदी के प्रति भी अहिंसा और प्रेम का भाव जो गांधी जी बताते हैं मैं इसका कायल हूं। आत्मशुद्धि आत्मनियंत्रण और शाकाहार जसी अवधारणा वर्तमान हमें काफी कुछ दे सकती हैं। गांधी जब न्यासिता या श्रम की व्याख्या करते हैं तो वह मार्क्‍स के करीब आ जाते हैं लेकिन कहीं भी वह हिंसक क्रांति की बात नहीं करते। शायद इसी लिए वह सहस्त्राब्दी के महापुरुष कहे जा रहे हैं।


मैं जिस पेशे से हूं उसमें रोज सुबह मन में एक गांधी को लेकर उठता हूं, दिन भर कई जहग धक्के खाता हूं, शाम को खबरें करता हूं (लेकिन गांधी को खबरों से दूर ही रखता हूं ) रात को मैं और मेरे मन का गांधी खाना खाकर सो जाता है। अगले दिन फिर कई गांधी, आजादी से पहले का गांधी, नेहरु का गांधी, इंदिरा का गांधी, सोनिया-मनमोहन का गांधी, कम्युनिस्टों और सोसलिस्टों का गांधी, मुन्नाभाई- सर्किट का गांधी और रात आते-आते फिर मैं और मेरा गाँधी.

{लेखक नई दिल्ली में सक्रिय पत्रकार हैं. आपने ही "सदाग्रह" ब्लॉग का विचार सुझाया.यह लेखक की पहली पोस्ट है}



(चित्र साभार:गूगल)(दायें चित्र में --अभिनव उपाध्याय)

3 टिप्‍पणियां:

डॉ .अनुराग ने कहा…

गांधी एक ऐसे इन्सान रहे है जिनसे आपके लव -हेट रिलेशन जीवन भर चलते है ...आप उनसे कई मुद्दों पे सहमत होते है .असहयोग आन्दोनल के उनके कांसेप्ट से हतप्रभ भी होते है .पर जीवन की उनकी कई हठो से असहमत भी होते है ...दिक्कत गांधी को इन्सान से ऊपर का दर्जा देने की है जहां उनके समर्थक उन्हें तमाम आलोचनायो से परे मानते है ....

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

गाँधी जी आजीवन व्यवहार
को प्रमुखता देते रहे [जैसे सत्य-आचरण
आदि ] , इसलिए उन्हें व्यवहार
के रस्ते जानना अभीष्ट होगा | किताबें
संख्या और आकार में अधिक होने के
बावजूद समझा नहीं सकतीं |
आपका लेख अच्छा लगा |
धन्यवाद्...

ज्ञानदत्त पाण्डेय| Gyandutt Pandey ने कहा…

गांधी की प्रासंगिकता यही है कि वे आपको गांधी नहीं, आपको बेहतर आप बनाने में सहायक हैं!