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मंगलवार, 2 अक्तूबर 2018

गांधी व्यक्ति होते तो विचार में भी उतरते: गाँधी और मै- प्रेम शंकर मिश्र

साभार: आईएमवायर 

गांधी के देश में गांधी उस वक्त खत्म नहीं हुए जब वे गोडसे का शिकार हुए। गांधी की सोच को सबसे अधिक नुकसान इस धारणा से पहुंचा कि ‘गांधी व्यक्ति नहीं विचार हैं।’ आजादी के बाद पैदा हुए लोगों के पास गांधी को जानने के लिए इकलौता जरिए किताबें है, लेकिन वो किताबें नहीं जो गांधी ने लिखकर छोड़ी हैं, हूबहू वैसी ही जैसे वे थे। तमाम पीढ़ियों ने गांधी को उन किताबों से जाना है जो स्कूल में अगले क्लास की सीढ़ी चढ़ने के लिए जरूरी थी। एक और तरीका सरकारी अनुष्ठान का है। यह गांधी के जाने के बाद से लेकर आजतक हूबहू वैसे ही चला आ रहा है। रामधुन का गायन, चरखा चलाना, उनके विचारों संग व्यभिचार करने वालों के मुंह से फूल झड़ना। बनावटपने और नकलीपन की बदबू हर दौर में एक जैसी। इसलिए गांधी एक अनुष्ठान के तरह दिमाग में चस्पा तो हैं लेकिन विचार के तरह दिल में और व्यहार की तरह आचरण में उतर न पाए। न कभी किसी सरकार ने चाहा कि गांधी आचरण में उतरे और न ही कभी बाजार ने। वजह साफ थी कि सरकार और बाजार के प्रचलित सोच के लिए तो गांधी जीते जी ही खतरा बन चुके थे। 

पाठ्यक्रम से इतर गांधीजी को पढ़ने की वजह वो नोट बनी जिस पर गांधीजी चस्पा हैं। वर्धा विश्वविद्यालय में गांधी के विचारों पर हर साल भाषण प्रतियोगिता होती थी। प्रथम पुरस्कार पर 10 हजार मिलते थे। सांत्वना में भी 2-3 हजार मिलना होता था। 2004 में हमारे लिए यह लाख से कम नहीं था। इसलिए यहां जाना हमारे लिए ओलपिंक सरीखा ही था। इस स्वार्थ ने गोरखपुर विश्वविद्यालय के लाइब्रेरी में रहे गांधी वांग्मय पर पड़ी धूल झाड़ने को मजबूर कर दिया।

संयोग देखिए कि गांधी को आम आदमी तक कहीं अधिक से सहजता से सिनेमा ने पहुंचाया। रिचर्ड एटेनबरो की ‘गांधी’ ने उनके वैचारिक पक्ष संग विलक्षण व्यक्तित्व की एक बड़े तबके तक पहुंच बनाई। ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ की ‘गांधीगीरी’ ने सीमित संदर्भ में ही यह बज क्रिएट किया कि गाली के बजाय फूल देना भी असर करता है। हालांकि, इन सबकी सीमाएं यह थी कि यह त्वरित प्रभाव से उभरी प्रतिक्रिया थी अंतर्निहित आचरण का भाग नहीं। इसलिए ये धूमकेतु की तरह चमके और खत्म हो गए। 

गांधी का मूल्यांकन और विमर्श व्यक्ति के तौर पर होता तो वे स्वाधीनता आंदोलन की परिधि से बाहर निकल सहमतियों और असहमतियों के लिए भी प्रस्तुत होते। इससे गांधी की सर्जना और वर्जना दोनों को लेकर ही उठने वाले आवश्यक और अनावश्यक प्रश्न उत्तरित होते। भ्रांतियों को तथ्य के तौर पर स्थापित होने, गांधी के बहुत से प्रयोगों को अतिवाद के तौर पर प्रचारित किये जाने की से बचा जा सकता था। यह समझना आसान होता कि गांधी में हमे जो चरम, हठ या अतिवाद दिखता है वह इसलिए है क्योंकि कर्म और व्यवहार के साम्य को हमने कभी जिया नहीं और गांधी कभी उससे डिगे नहीं। इसलिए जो हमारे लिए चरम है वह उनके लिए सहज था। 

इसलिए सबसे जरूरी था कि व्यक्ति के तौर पर, नजीर के तौर पर गांधी हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में जोड़े जाते। गांधी की सत्यप्रियता, स्वच्छता, समता के मूल्य की प्रारंभिक शिक्षा तो अपने अभिभावकों के जरिए हममें से हर कोई बचपन में पाता है। लेकिन, यह हमारे विकास के साथ ही दम इसलिए तोड़ने लगती है क्योंकि आचरण व आत्मानुशासन को लेकर जो आग्रह हमारे साथ बचपन में जुड़ते हैं उन्हें बड़ा होते ही अनावश्यक मान लिया जाता है। इसके साथ ही गांधी लाइब्रेरी की कोठरियों के अंधेरों में खो जाते हैं। 

गांधी ने स्वाधीनता के आंदोलन में अहिंसा के तत्व को प्रधानता इसलिए दी क्योंकि दक्षिण अफ्रीका में कमोवेश ऐसी ही परिस्थतियों में वह इसका सफल प्रयोग कर सके थे। उन्हें पता था कि अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध की सीमाएं संसाधन ही नहीं वैश्विक अवधारणाओं से भी जुड़ती थीं। इसमें हर पक्ष के पास सदैव स्वयं को सही ठहराने के बराबर मौके थे भले ही यह संघर्ष कितना ही एकतरफा क्यों न हो। अहिंसा एक ऐसा हथियार था है और रहेगा जो किसी भी कानून की कसौटी पर आपके विपक्ष में नहीं जा सकता। हम बड़ी आसानी से जब इसे नकार देते हैं तो वास्तव में इसके पीछे के आत्मानुशासन व तपस्या की लंबी यात्रा की उपेक्षा कर देते हैं। जरा सोचिए! छोटी से छोटी बात पर हमारा खून उबलता है। सामने वाले को सबक सिखाने के लिए मन आतुर रहता है। किसी भी घटना पर त्वरित व प्राथमिक विचार हिंसा का आता है। हिंसा के प्राथमिक भाव को अहिंसा से विस्थापित करना इतना सहज है क्या? एक बड़ा तबका बुनियादी जरूरतों का मोहताज है इसलिए अपनी सुविधाओं को लात मार देना सहज है क्या? सबसे बड़ी बात! पहाड़ जैसी ऊंचाई छूने के बाद भी खुद को गलत मानने और अपनाने खिलाफ भी खड़ा होने का साहस सहज है क्या? गांधी के हर सिद्धांत स्वयं से शुरू होते हैं और हमारे दूसरों से। इसलिए गांधी विचार की दहलीज पर ही टकराकर लौट जाते हैं।

*लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं सम्प्रति प्रतिष्ठित नवभारत टाइम्स में प्रधान संवाददाता हैं। 

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